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बाम तक न पहुँचे!
जो नक़ाब-ए-रुख़ उठा दी तो ये क़ैद भी लगा दी, उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे| शकील बदायूनी
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सलाम तक न पहुँचे!
ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक, मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे|
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शाम तक न पहुँचे!
नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है, ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे|
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प्रेम पर कविता – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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ये चराग़ तू ही बुझा न दे!
मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी, मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे| शकील बदायूनी
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मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे!
मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे, मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे| शकील बदायूनी
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तमसो मा ज्योतिर्गमय!
हिन्दी नवगीत के शलाका पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| नवगीत के मामले में शंभुनाथ सिंह जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – बुझी न दीप…
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कितने दिन इतराओगे!
‘फ़ैज़’ दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी, तुम इस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर कितने दिन इतराओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उनको क्या जतलाओगे!
किसने वस्ल का सूरज देखा किस पर हिज्र की रात ढली, गेसुओं वाले कौन थे क्या थे उनको क्या जतलाओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़