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शोले की लपक भूल भी जाएँ!
हम शौक़ के शोले की लपक भूल भी जाएँ, वो शम-ए-फ़सुर्दा का धुआँ याद रहेगा| इब्न-ए-इंशा
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दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा!
वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगी, वो दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा| इब्न-ए-इंशा
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वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा!
उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा, वो शहर वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा| इब्न-ए-इंशा
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ओ मेरी जिंदगी!
एक बार फिर से मैं आज हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| आपातकाल में अपनी विद्रोही ग़ज़लों से उनको बहुत प्रसिद्धि प्राप्त हुई थी| दुष्यंत जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता…
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तुम्हीं को दोष दूँगी ऐ नज़ारो!
तुम्हीं से दिल ने सीखा है तड़पना, तुम्हीं को दोष दूँगी ऐ नज़ारो| कैफ़ी आज़मी
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हवा ने बुझाए हैं क्या क्या!
कहीं अँधेरे से मानूस हो न जाए अदब, चराग़ तेज़ हवा ने बुझाए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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दीवाने आए हैं क्या क्या!
उठा के सर मुझे इतना तो देख लेने दे, कि क़त्ल-गाह में दीवाने आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी