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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Mar 2023

    धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्या!

    छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल, वहीं से धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी

  • 18th Mar 2023

    ज़ख़्म- मुस्कुराए हैं क्या क्या!

    जब उसने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया, तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी

  • 18th Mar 2023

    हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या!

    कहीं से लौट के हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या, सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी

  • 18th Mar 2023

    हम!

    आज फिर से मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि और प्रसिद्ध उच्च अधिकारी रहे श्री अशोक वाजपेयी जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक जी का किसी समय भारत सरकार की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नीति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा था| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…

  • 17th Mar 2023

    कोई भी फूल मुरझाया न था!

    सिर्फ़ ख़ुश्बू की कमी थी ग़ौर के क़ाबिल ‘क़तील’, वर्ना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था| क़तील शिफ़ाई

  • 17th Mar 2023

    वो पहले तो नज़र आया न था!

    अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ, अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था| क़तील शिफ़ाई

  • 17th Mar 2023

    किसे दुनिया ने पहनाया न था!

    वो पयम्बर हो कि आशिक़ क़त्ल-गाह-ए-शौक़ में, ताज काँटों का किसे दुनिया ने पहनाया न था| क़तील शिफ़ाई

  • 17th Mar 2023

    कोई भी सरमाया न था!

    हो गए क़ल्लाश जब से आस की दौलत लुटी, पास अपने और तो कोई भी सरमाया न था| क़तील शिफ़ाई

  • 17th Mar 2023

    कोई हम-साया न था!

    ख़ूब रोए छुप के घर की चार-दीवारी में हम, हाल-ए-दिल कहने के क़ाबिल कोई हम-साया न था| क़तील शिफ़ाई

  • 17th Mar 2023

    इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था!

    उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिसमें मुख़िल, ज़िंदगी में इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था| क़तील शिफ़ाई

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