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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Oct 2022

    कोई इम्तिहान बाक़ी है!

    अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है, अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है| जावेद अख़्तर

  • 9th Oct 2022

    बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है!

    न फ़िक्र कोई न जुस्तुजू है न ख़्वाब कोई न आरज़ू है, ये शख़्स तो कब का मर चुका है तो बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है| जावेद अख़्तर

  • 9th Oct 2022

    न पूछा दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है!

    कोई अगर पूछता ये हमसे बताते हम गर तो क्या बताते, भला हो सबका कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है| जावेद अख़्तर

  • 9th Oct 2022

    मुझको तेरी तलाश क्यूँ है!

    कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यूँ है, कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इर्तिआ’श क्यूँ है| जावेद अख़्तर

  • 9th Oct 2022

    कभी-कभी बहुत भला लगता है!

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, ये एक प्रसिद्ध कवि थे और मैंने इनकी रचनाएं पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह रचना- कभी-कभी बहुत भला लगता है —चुप-चुप सब कुछ सुननाऔर कुछ न बोलना…

  • 8th Oct 2022

    इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें!

    ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें, इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं!

    देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ, मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    ख़्वाब पलकों पे सजाने के लिए हैं!

    आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे, ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं!

    सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की, वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं!

    अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें, कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

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