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ज़िंदगी जो इस तरह मुश्किल न हो!
चाहता हूँ मैं ‘मुनीर’ इस उम्र के अंजाम पर, एक ऐसी ज़िंदगी जो इस तरह मुश्किल न हो| मुनीर नियाज़ी
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इस ख़ौफ़ में दाख़िल न हो!
वो खड़ा है एक बाब-ए-इल्म* की दहलीज़ पर, मैं ये कहता हूँ उसे इस ख़ौफ़ में दाख़िल न हो|‘Gate to knowledge’ मुनीर नियाज़ी
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मगर तू दीद के क़ाबिल न हो!
वहम ये तुझ को अजब है ऐ जमाल-ए-कम-नुमा, जैसे सब कुछ हो मगर तू दीद के क़ाबिल न हो| मुनीर नियाज़ी
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राह जिसकी कोई मंज़िल न हो!
हैं रवाँ उस राह पर जिसकी कोई मंज़िल न हो, जुस्तुजू करते हैं उसकी जो हमें हासिल न हो| मुनीर नियाज़ी
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ज़िंदगी बता कि वो लम्हे किधर गए!
हर शय से बे-नियाज़ रहे जिनमें हुस्न ओ इश्क़, ऐ ज़िंदगी बता कि वो लम्हे किधर गए| महेश चंद्र नक़्श
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किसी के आज जो गेसू बिखर गए!
नैरंगियाँ चमन की पशेमान हो गईं, रुख़ पर किसी के आज जो गेसू बिखर गए| महेश चंद्र नक़्श
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इसी हसरत में मर गए!
दुनिया से हट के इक नई दुनिया बना सकें, कुछ अहल-ए-आरज़ू इसी हसरत में मर गए| महेश चंद्र नक़्श
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हादसे जो दिल पे हमारे गुज़र गए!
तस्वीर-ए-ज़िंदगी में नया रंग भर गए, वो हादसे जो दिल पे हमारे गुज़र गए| महेश चंद्र नक़्श
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सत्य नहीं होता सपना है!
आज एक बार फिर मैं किसी ज़माने में कविता में अपने अनूठे अंदाज़ के कारण घूम मचाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत- सत्य नहीं होता सपना है।सपनों में लाखों आते हैं,जो मन वीणा पर गाते हैं;पर…