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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th May 2023

    नींद से जगा भी गया!

    उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था, सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    जिगर जला भी गया!

    हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया, ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    मेरे तिरे दरमियाँ तो है!

    मुझ से बहुत क़रीब है तू फिर भी ऐ ‘मुनीर’, पर्दा सा कोई मेरे तिरे दरमियाँ तो है| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    शायद वो मिल ही जाए!

    आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए, वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    मगर पासबाँ तो है!

    इक चील एक मुम्टी पे बैठी है धूप में, गलियाँ उजड़ गई हैं मगर पासबाँ तो है| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    कहीं गुल्सिताँ तो है!

    यूँ तो है रंग ज़र्द मगर होंट लाल हैं, सहरा की वुसअ’तों में कहीं गुल्सिताँ तो है| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    कोई दास्ताँ तो है!

    देती नहीं अमाँ जो ज़मीं आसमाँ तो है, कहने को अपने दिल से कोई दास्ताँ तो है| मुनीर नियाज़ी

  • 5th May 2023

    बनेंगी साँपिन!

    आज एक बार फिर से मैं मेरे लिए गुरुतुल्य रहे हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का  एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|  बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत  – बंद हैं मुट्ठी मेंचंद सुर्ख-पंक्तियाँमुट्ठी…

  • 4th May 2023

    बूँदें दो बरसा न सके!

    मन पापी की उजड़ी खेती सूखी की सूखी ही रही, उमडे बादल गरजे बादल बूँदें दो बरसा न सके|   इब्न-ए-इंशा

  • 4th May 2023

    फाँद न पाए ढा न सके!

    अब तुझसे किस मुँह से कह दें सात समुंदर पार न जा, बीच की इक दीवार भी हम तो फाँद न पाए ढा न सके| इब्न-ए-इंशा

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