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हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी!
बिछड़ के डार से बन बन फिरा वो, हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी| जावेद अख़्तर
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क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी!
हमारे शौक़ की ये इंतिहा थी, क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी| जावेद अख़्तर
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बाँच ली मैंने व्यथा!
आज मैं छायावाद युग की प्रमुख कवियित्री और देखा जाए तो हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी महिला कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| महादेवी वर्मा जी के गीतों में करुणा और संवेदनाओं के अनेक स्तरों का हम अनुभव कर सकते हैं| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी…