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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Nov 2022

    हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी!

    बिछड़ के डार से बन बन फिरा वो, हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी!

    हमारे शौक़ की ये इंतिहा थी, क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    अब कहाँ है बिखर गया कब का!

    ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा, अब कहाँ है बिखर गया कब का| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का!

    उसका जो हाल है वही जाने, अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    पार अकेले उतर गया कब का!

    वो जो लाया था हम को दरिया तक, पार अकेले उतर गया कब का| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    लूट के अपने घर गया कब का!

    ढूँढता था जो इक नई दुनिया, लूट के अपने घर गया कब का| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    जो दीवाना मर गया कब का!

    वो ज़माना गुज़र गया कब का, था जो दीवाना मर गया कब का| जावेद अख़्तर

  • 7th Nov 2022

    बाँच ली मैंने व्यथा!

    आज मैं छायावाद युग की प्रमुख कवियित्री और देखा जाए तो हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी महिला कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| महादेवी वर्मा जी के गीतों में करुणा और संवेदनाओं के अनेक स्तरों का हम अनुभव कर सकते हैं| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी…

  • 6th Nov 2022

    है क़ैस कोई जो दिल लगाए!

    लैला ने नया जनम लिया है, है क़ैस कोई जो दिल लगाए| कैफ़ी आज़मी

  • 6th Nov 2022

    काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए!

    जंगल की हवाएँ आ रही हैं, काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए| कैफ़ी आज़मी

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