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रसवन्ती!
आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह जी दिनकर जी की एक अलग तरह की कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी इस कविता में दर्शाते हैं कि कवि कोमल कान्त पदावली में अच्छी बातें लिखता रहता है, सोचता रहता है और मानव सभ्यता एक अलग ही रास्ते पर आगे बढ़ जाती है| लीजिए प्रस्तुत है दिनकर जी…
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मरघट!
किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों से जिन कवियों को सुनने में मुझे काफी आनंद आता था, उनमें स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी भी शामिल थे| उनके एक गीत की पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुई थीं- एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल…