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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Nov 2022

    रसवन्ती!

    आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह जी दिनकर जी की एक अलग तरह की कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी इस कविता में दर्शाते हैं कि कवि कोमल कान्त पदावली में अच्छी बातें लिखता रहता है, सोचता रहता है और मानव सभ्यता एक अलग ही रास्ते पर आगे बढ़ जाती है| लीजिए प्रस्तुत है दिनकर जी…

  • 8th Nov 2022

    ये देखिए कोई मुझे पहचाना भी!

    जानने वालों की इस भीड़ से क्या होगा ‘वसीम’, इसमें ये देखिए कोई मुझे पहचाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    समुंदर की तरफ़ जाना भी!

    ख़ुद को पहचान के देखे तो ज़रा ये दरिया, भूल जाएगा समुंदर की तरफ़ जाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    और तिरा कहलाना भी!

    ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं, तेरा होना भी नहीं और तिरा कहलाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी!

    जाने कब शहर के रिश्तों का बदल जाए मिज़ाज, इतना आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    इक दिन तिरा याद आना भी!

    दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी, भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    होना ही नहीं फूल नज़र आना भी!

    कैसी आदाब-ए-नुमाइश ने लगाईं शर्तें, फूल होना ही नहीं फूल नज़र आना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी!

    कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी, तुझ से ही फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी| वसीम बरेलवी

  • 8th Nov 2022

    मरघट!

    किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों से जिन कवियों को सुनने में मुझे काफी आनंद आता था, उनमें स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी भी शामिल थे| उनके एक गीत की पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुई थीं- एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल…

  • 7th Nov 2022

    अंजाम की वो इब्तिदा थी!

    मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था, मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी| जावेद अख़्तर

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