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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Nov 2022

    ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की!

    हम कि दुख ओढ़ के ख़ल्वत में पड़े रहते हैं, हमने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की| अहमद फ़राज़

  • 11th Nov 2022

    सुराही ने भी गर्दिश नहीं की!

    इक तो हम को अदब आदाब ने प्यासा रक्खा, उस पे महफ़िल में सुराही ने भी गर्दिश नहीं की| अहमद फ़राज़

  • 11th Nov 2022

    हमने गुज़ारिश नहीं की!

    ये भी क्या कम है कि दोनों का भरम क़ाएम है, उसने बख़्शिश नहीं की हमने गुज़ारिश नहीं की| अहमद फ़राज़

  • 11th Nov 2022

    जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की!

    जिस क़दर उससे त’अल्लुक़ था चला जाता है, उसका क्या रंज हो जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की| अहमद फ़राज़

  • 11th Nov 2022

    उसने भी पुर्सिश नहीं की!

    अहल-ए-महफ़िल पे कब अहवाल खुला है अपना, मैं भी ख़ामोश रहा उसने भी पुर्सिश* नहीं की|*पूछताछ अहमद फ़राज़

  • 11th Nov 2022

    होंठों ने जुम्बिश नहीं की!

    सामने उसके कभी उसकी सताइश* नहीं की, दिल ने चाहा भी अगर होंठों ने जुम्बिश नहीं की|*प्रशंसा अहमद फ़राज़

  • 11th Nov 2022

    मुसाफिर जाएगा कहाँ!

    आज काफी दिनों बाद एक फिल्मी गीत शेयर करने का मन हो रहा है | ऐसे ही इस गीत की पंक्तियाँ दोहराते हुए खयाल आया कि फिल्म- गाइड के लिए लिखे इस गीत में शैलेन्द्र जी ने कितनी सरल भाषा में जीवन दर्शन पिरो दिया है- कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी, पानी पे लिखी…

  • 10th Nov 2022

    रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ!

    रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ, हर नए दिन नया इंतिज़ार आदमी| निदा फ़ाज़ली

  • 10th Nov 2022

    हर जगह बे-शुमार आदमी!

    हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी| निदा फ़ाज़ली

  • 10th Nov 2022

    मौसम को उस्ताद किया!

    दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही, सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया| निदा फ़ाज़ली

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