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रस्म-ए-उल्फ़त देखिए
थी ख़ता उनकी मगर जब आ गए वो सामने, झुक गईं मेरी ही आँखें रस्म-ए-उल्फ़त देखिए| जोश मलीहाबादी
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वाह क्या अशआर हैं
रश्हा-ए-शबनम बहार-ए-गुल फ़रोग़-ए-मेहर-ओ-माह, वाह क्या अशआर हैं दीवान-ए-फ़ितरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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एक चश्मा हुस्न का!
फूट निकलेगा जबीं से एक चश्मा हुस्न का, सुब्ह उठ कर ख़ंदा-ए-सामान-ए-क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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आदमियत देखिए!
ये भी कोई बात है हर वक़्त दौलत का ख़याल, आदमी हैं आप अगर तो आदमियत देखिए| जोश मलीहाबादी
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जगह-जगह दरवाज़े!
आज मैं अपने मित्र और अग्रज स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| नवीन जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता – दीवारें सिर्फ छप्पर साधने के लिए थींजगह-जगह दरवाज़े हमारेखुले हुए थेखिड़कियाँ थींबारजे थे आँगने थे…
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ज़ब्त पर है किस क़दर
मौत भी आई तो चेहरे पर तबस्सुम ही रहा, ज़ब्त पर है किस क़दर हम को भी क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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देखिए दुनिया के मंज़र!
सिर्फ़ इतने के लिए आँखें हमें बख़्शी गईं, देखिए दुनिया के मंज़र और ब-इबरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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मेरी सूरत देखिए!
मुस्कुरा कर इस तरह आया न कीजे सामने, किस क़दर कमज़ोर हूँ मैं मेरी सूरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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मेरी ज़रूरत देखिए!
आप इक जल्वा सरासर मैं सरापा इक नज़र, अपनी हाजत देखिए मेरी ज़रूरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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उनकी सूरत देखिए!
मेरी हालत देखिए और उनकी सूरत देखिए, फिर निगाह-ए-ग़ौर से क़ानून-ए-क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी