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अब ये नेकी भी हमें
अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है, सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हमने| जाँ निसार अख़्तर
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बहुत दिन हमने!
ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हमने, वक़्त ख़्वाबों में गँवाया है बहुत दिन हमने| जाँ निसार अख़्तर
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गुज़ारा ही न हो!
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ, न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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भारत!
आज एक बार फिर से मैं राष्ट्रप्रेम, महात्मा गांधी जी आदि पर कुछ अमर रचनाएं देने वाले प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की यह कविता – भारत तू है हमको…
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गवारा ही न हो!
ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको, दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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अश्कों की लकीर!
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर, सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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तू ने पुकारा ही न हो!
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी, चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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खिलते फूल मिलाप के
ये चली है कैसी हवा कि अब नहीं खिलते फूल मिलाप के, कभी दौर-ए-फ़स्ल-ए-बहार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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याद हो कि न याद हो!
कभी हम में तुम में भी प्यार था तुम्हें याद हो कि न याद हो, न किसी के दिल में ग़ुबार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी