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कोई हुक्म नहीं चलता है!
हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है, हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब* करते हैं|*योग्यता राहत इन्दौरी
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सूरज की है जितनी अज़्मत!
आपकी नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत, हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं| राहत इन्दौरी
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कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं!
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं, और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं| राहत इन्दौरी
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पहेलियाँ!
आज कुछ अलग करते हैं, आज खड़ी बोली के प्रारंभिक कवियों में गिने जाने वाले अमीर खुसरो जी की लिखी कुछ पहेलियाँ शेयर कर रहा हूँ, इनका आनंद लीजिए– तरवर से इक तिरिया उतरी उसने बहुत रिझायाबाप का उससे नाम जो पूछा आधा नाम बतायाआधा नाम पिता पर प्यारा बूझ पहेली मोरीअमीर ख़ुसरो यूँ कहेम…
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ये कलाम किसका कलाम है!
कोई नग़्मा धूप के गाँव सा कोई नग़्मा शाम की छाँव सा, ज़रा इन परिंदों से पूछना ये कलाम किसका कलाम है| बशीर बद्र
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वो दिलों में आग लगाएगा!
वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा, उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है| बशीर बद्र
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ये ज़रूरतों का सलाम है!
कहाँ अब दुआओं की बरकतें वो नसीहतें वो हिदायतें, ये मुतालबों का ख़ुलूस है ये ज़रूरतों का सलाम है| बशीर बद्र
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ये शराफ़तें नहीं बे-ग़रज़!
यूँही रोज़ मिलने की आरज़ू बड़ी रख-रखाव की गुफ़्तुगू ,ये शराफ़तें नहीं बे-ग़रज़ इसे आप से कोई काम है| बशीर बद्र
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कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है!
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है, कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है| बशीर बद्र