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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Jun 2023

    मय-ख़ाने का दरवाज़ा

    कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइ’ज़, पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    जीने और मरने का!

    मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का, उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    ख़त हमसे लिखवाए!

    मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हम से लिखवाए, हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    पेच-ओ-ख़म निकले!

    भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का, अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    बहुत बे-आबरू होकर

    निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन, बहुत बे-आबरू होकर तिरे कूचे से हम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    यूँ दम-ब-दम निकले!

    डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर, वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    ख़्वाहिश पे दम निकले!

    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 24th Jun 2023

    जीवन के पतझड़ में!

    किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और अनूठी प्रस्तुति शैली से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का एक सुंदर गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंग जी  की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का यह गीत  –…

  • 23rd Jun 2023

    पथरा गया है आँखों में!

    कौन पथरा गया है आँखों में, बर्फ़ पलकों पे क्यूँ जमी सी है|   गुलज़ार

  • 23rd Jun 2023

    कुछ देर से थमी सी है!

    दफ़्न कर दो हमें कि साँस आए, नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है| गुलज़ार

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