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तो बार बार दिखे!
कोई तिलिस्मी सिफ़त थी जो इस हुजूम में वो, हुए जो आँख से ओझल तो बार बार दिखे| गुलज़ार
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हमको इंतिज़ार दिखे!
कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़, किसी की आँख में हमको भी इंतिज़ार दिखे| गुलज़ार
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जब भी आबशार दिखे!
रवाँ हैं फिर भी रुके हैं वहीं पे सदियों से, बड़े उदास लगे जब भी आबशार* दिखे| *झरना गुलज़ार
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जो न बन पाई तुम्हारे!
आज मैं हिन्दी काव्य परंपरा के एक अत्यंत श्रेष्ठ कवि, जिन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे, ऐसे प्रखर राष्ट्रवादी कवि स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की यह रचना –…
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फूल बे-शुमार दिखे!
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री, ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे| गुलज़ार