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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Jun 2023

    सहर होने को भी हम!

    ‘फ़िराक़’ इस गर्दिश-ए-अय्याम से कब काम निकला है, सहर होने को भी हम रात कट जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 22nd Jun 2023

    न हम दरिया समझते हैं

    ये हस्ती नीस्ती सब मौज-ख़ेज़ी है मोहब्बत की, न हम क़तरा समझते हैं न हम दरिया समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 22nd Jun 2023

    रौंदते जाते हैं काँटों को

    ये कह कर आबला-पा रौंदते जाते हैं काँटों को, जिसे तलवों में कर लें जज़्ब उसे सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 22nd Jun 2023

    तुझे अपना समझते हैं!

    भुला दीं एक मुद्दत की जफ़ाएँ उसने ये कह कर, तुझे अपना समझते थे तुझे अपना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी  

  • 22nd Jun 2023

    लोग तेरी सादगी को!

    न शोख़ी शोख़ है इतनी न पुरकार इतनी पुरकारी, न जाने लोग तेरी सादगी को क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 22nd Jun 2023

    होश आया मोहब्बत में!

    हमारा ज़िक्र क्या हमको तो होश आया मोहब्बत में, मगर हम क़ैस का दीवाना हो जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 22nd Jun 2023

    तेरी आवाज़!

    आज मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की यह रचना  –   कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़अब सुनाए कोई वही आवाज़। ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी…

  • 21st Jun 2023

    वही मरना समझते हैं!

    जहाँ की फितरत-ए-बेगाना में जो कैफ़-ए-ग़म भर दें, वही जीना समझते हैं वही मरना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 21st Jun 2023

    सहरा समझते हैं!

    कहीं हों तेरे दीवाने ठहर जाएँ तो ज़िंदाँ है, जिधर को मुँह उठा कर चल पड़े सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 21st Jun 2023

    खटका समझते हैं!

    यही ज़िद है तो ख़ैर आँखें उठाते हैं हम उस जानिब, मगर ऐ दिल हम इसमें जान का खटका समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

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