-
गुलाब कर दूँगा!
सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा, मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा| राहत इंदौरी
-
तो हिसाब करूँ!
ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही, कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ| राहत इंदौरी
-
मैं करवटों के नए!
मैं करवटों के नए ज़ाइक़े लिखूँ शब-भर, ये ‘इश्क़ है तो कहाँ ज़िंदगी ‘अज़ाब करूँ| राहत इंदौरी
-
कब से तुम गा रहे!
आज मैं हिन्दी नवगीत के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की यह रचना – कब से तुम गा रहे, कब से तुम गा रहेकब से तुम गा रहे ! जाल…
-
भीड़ गूँगे बहरों की!
है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की, किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ| राहत इंदौरी
-
मुझे बुतों से इजाज़त
मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए, तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ| राहत इंदौरी
-
रूह के छालों का कुछ!
अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ, मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ| राहत इंदौरी
-
आँखों में आँसू आए!
उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया, मुद्दतों बा’द मिरी आँखों में आँसू आए| बशीर बद्र
-
शोख़ को जादू आए!
उसकी बातें कि गुल-ओ-लाला पे शबनम बरसे, सब को अपनाने का उस शोख़ को जादू आए| बशीर बद्र