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क़ातिलों को गुमाँ न हो!
करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न, मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो, कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन पस-ए-मर्ग हम ने भुला दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो वो क़र्ज़ रखते थे!
मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो, जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दाग़-दाग़ लुटा दिया!
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया, जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आग का अपना-पराया क्या!
आज एक बार फिर से मैं, किसी समय अपनी कविताओं और गीतों से काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले प्रसिद्ध कवि और स्वर्गीय शिशुपालसिंह निर्धन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| निर्धन जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपालसिंह निर्धन जी का यह गीत…
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वो गुनाहगार चले गए!
न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दाग़ थे जो सजा के हम
ये हमीं थे जिनके लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गई, यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इख़्तियार चले गए!
न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़म-गुसार चले गए!
तिरी कज-अदाई से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जाँ-निसार चले गए!
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मेरे देश के लाल!
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है प्रसिद्ध कवि और राजनेता रहे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता| बैरागी जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह कविता – पराधीनता को जहाँ समझा श्राप महानकण-कण के खातिर जहाँ हुए कोटि…