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चाँदनी चुप-चाप!
आज अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चाँदनी रात को लेकर अज्ञेय जी की यह अपनी ही प्रकार की अभिव्यक्ति है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की यह कविता – चाँदनी चुप-चाप सारी रातसूने आँगन मेंजाल रचती रही।मेरी रूपहीन अभिलाषाअधूरेपन की मद्धिमआँच पर तँचती रही।व्यथा मेरी अनकहीआनन्द की…
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इसका नया इलाज भी हो!
बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में, मरज़ पुराना है इसका नया इलाज भी हो| निदा फ़ाज़ली
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जो बदलता है वो समाज भी हो!
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं, हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो| निदा फ़ाज़ली
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कुछ और काम-काज भी हो!
न करते शोर-शराबा तो और क्या करते, तुम्हारे शहर में कुछ और काम-काज भी हो| निदा फ़ाज़ली
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कल क्यूँ कभी तो आज भी हो!
रहेगी वा’दों में कब तक असीर ख़ुश-हाली, हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो| निदा फ़ाज़ली
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घर में दिया भी जले अनाज भी हो!
हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो, अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज* भी हो|*Protest निदा फ़ाज़ली
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हर चीज़ नज़र आएगी बेमा’नी सी!
पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे-मा’नी सी, और फिर अपनी ही नज़रों से उतर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे!
हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं, छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे| निदा फ़ाज़ली