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रोटी जो खड़ा माँग रहा है मुझसे!
खो गया आज कहाँ रिज़्क़* का देने वाला, कोई रोटी जो खड़ा माँग रहा है मुझसे| *रोजगार जाँ निसार अख़्तर
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कोई जुर्म हुआ है मुझसे!
दिल का ये हाल कि धड़के ही चला जाता है, ऐसा लगता है कोई जुर्म हुआ है मुझसे| जाँ निसार अख़्तर
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हर दर्द मिरा छीन लिया है मुझसे!
हाए उस वक़्त को कोसूँ कि दुआ दूँ यारो, जिसने हर दर्द मिरा छीन लिया है मुझसे| जाँ निसार अख़्तर
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चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह!
हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह, हम ने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह| जाँ निसार अख़्तर
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तो लगता है कि तुम हो!
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में, शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
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साया कोई लहराए तो!
आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो, साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
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वाराणसी, लखनऊ यात्रा !
लंबे समय के बाद उत्तर प्रदेश और लखनऊ में फिर से जाना हुआ, जहां 10 वर्ष तक मेरा आवास था| यात्रा से जुड़ी ब्लॉग पोस्ट भी लंबे समय के बाद लिख रहा हूँ| मेरा बड़ा बेटा और बहू लंदन से आए, उन्होंने ही अग्रिम रूप से, सबकी एक साथ काशी यात्रा की योजना बनाई हुई…
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बड़ी धूम-धाम हो गई है!
पुरानी यादों ने जब भी लगा लिया फेरा, इस उजड़े दिल में बड़ी धूम-धाम हो गई है| राजेश रेड्डी
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मेहनत का दाम हो गई है!
हज़ारों आँसुओं के बअ’द इक ज़रा सी हँसी, किसी ग़रीब की मेहनत का दाम हो गई है| राजेश रेड्डी