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ग़म की कसक है हर ख़ुशी में!
निकल आते हैं आँसू हँसते हँसते, ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में| निदा फ़ाज़ली
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ग़ज़ल है नाम उसका शाएरी में!
जो खो जाता है मिलकर ज़िंदगी में, ग़ज़ल है नाम उसका शाएरी में| निदा फ़ाज़ली
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किसी को ढूँढ़ते हैं हम किसी में!
ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में, किसी को ढूँढ़ते हैं हम किसी में| निदा फ़ाज़ली
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तीन कविताएं !
श्री माहेश्वर तिवारी जी हिन्दी नवगीत के प्रमुख कवियों में शामिल हैं| आज मैं श्री माहेश्वर तिवारी जी का नवगीत नहीं अपितु तीन छोटी-छोटी कविताएं शेयर कर रहा हूँ, जिनका संदेश बड़ा है| लीजिए प्रस्तुत हैं श्री माहेश्वर तिवारी जी की यह कविताएं – एक हमारे सामनेएक झील है नदी बनती हुई एक नदी हैमहासागर…
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थोड़ा सुकूँ थोड़ा सा चैन!
हम भी जीने के लिए थोड़ा सुकूँ थोड़ा सा चैन, ढूँड सकते थे मगर हमको नहीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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जहाँ था ही नहीं, वहीं ढूँढना था!
दिल भी बच्चे की तरह ज़िद पे अड़ा था अपना, जो जहाँ था ही नहीं उस को वहीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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कोई ख़्वाब हसीं ढूँढना था!
नींद को ढूँड के लाने की दवाएँ थीं बहुत, काम मुश्किल तो कोई ख़्वाब हसीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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खोना था कहीं और कहीं ढूँढना था!
जुस्तुजू का इक अजब सिलसिला ता-उम्र रहा, ख़ुद को खोना था कहीं और कहीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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ढूँढ़ते फिरते थे उसे बन के हुजूम!
सब के सब ढूँडते फिरते थे उसे बन के हुजूम, जिसको अपने में कहीं अपने तईं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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अच्छा सा मकीं ढूँढना था!
पहले तामीर हमें करना था अच्छा सा मकाँ, फिर मकाँ के लिए अच्छा सा मकीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी