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जब दिन और रात बराबर हो!
अब ‘इंशा’-जी को बुलाना क्या अब प्यार के दीप जलाना क्या, जब धूप और छाया एक से हों जब दिन और रात बराबर हो| इब्न ए इंशा
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वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो!
जिस चीज़ से तुझ को निस्बत है जिस चीज़ की तुझ को चाहत है, वो सोना है वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो| इब्न ए इंशा
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चल नगरी में सौदागर हो!
अब हुस्न का रुत्बा आली है अब हुस्न से सहरा ख़ाली है, चल बस्ती में बंजारा बन चल नगरी में सौदागर हो| इब्न ए इंशा
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फिर मेल की सूरत क्यूँकर हो!
हम साँझ समय की छाया हैं तुम चढ़ती रात के चन्द्रमा, हम जाते हैं तुम आते हो फिर मेल की सूरत क्यूँकर हो| इब्न ए इंशा
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कोई मरहम हो कोई निश्तर हो!
ये दिल है कि जलते सीने में इक दर्द का फोड़ा अल्लहड़ सा, ना गुप्त रहे ना फूट बहे कोई मरहम हो कोई निश्तर हो| इब्न ए इंशा
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हम नदियाँ हैं तुम सागर हो!
इक भीक के दोनों कासे हैं इक प्यास के दोनो प्यासे हैं, हम खेती हैं तुम बादल हो हम नदियाँ हैं तुम सागर हो| इब्न ए इंशा
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अब आन मिलो तो बेहतर हो!
दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो, इस बात से हमको क्या मतलब ये कैसे हो, ये क्यूँकर हो| इब्न ए इंशा
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चेतक की वीरता!
आज विशेष रूप से महाराणा प्रताप की वीरता की कथाओं को अपनी कविताओं के माध्यम से स्वर देने वाले स्वर्गीय श्यामनारायण पाण्डेय जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ जो राणा प्रताप जी के घोड़े चेतक के कौशल और उसके बलिदान को दर्शाती है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय श्यामनारायण पाण्डेय जी की यह…