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बे-वुज़ू ही सही!
न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में, नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आरज़ू ही सही!
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही, नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दो मेघ मिले बोले-डोले!
किसी समय काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले एक प्रमुख कवि रहे स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| आशा है प्रेम की महानता को रेखांकित करने वाली यह कविता आपको पसंद आएगी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – दो मेघ मिले…
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रह रह कर याद आएँगे!
आज जो इस बेदर्दी से हँसता है हमारी वहशत पर, इक दिन हम उस शहर को ‘राही’ रह रह कर याद आएँगे| राही मासूम रज़ा
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अमृत पी के अमर हो जाएँगे!
ज़मज़म और गंगा-जल पी कर कौन बचा है मरने से, हम तो आँसू का ये अमृत पी के अमर हो जाएँगे| राही मासूम रज़ा
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कब लोग रिहाई पाएँगे!
परछाईं के इस जंगल में क्या कोई मौजूद नहीं, इस दश्त-ए-तन्हाई से कब लोग रिहाई पाएँगे| राही मासूम रज़ा
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ज़िंदगी बैठी रही पर्दा किए!
अहल-ए-दिल सहरा में गुम होते रहे, ज़िंदगी बैठी रही पर्दा किए| राही मासूम रज़ा