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वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से!
नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से, बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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ख़ुदा जाने ख़ता क्या है!
गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़, सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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देखें सितम की इंतिहा क्या है!
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है, हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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स्त्री!
आज हिन्दी के एक वरिष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में उन्होंने स्त्री को लेकर कुछ अलग प्रकार की अभिव्यक्ति की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – एक हँसी का नाम है स्त्रीस्त्री एक रुलाई का नाम…
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हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी!
बदन पर नई फ़स्ल आने लगी, हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी| आदिल मंसूरी
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बिखर रहे हैं पुरानी किताब के!
किस तरह जम्अ’ कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के| आदिल मंसूरी