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पचास साल का इंसान!
आज एक बार फिर मैं देश में हिन्दी के एक वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता, जिसमें पचास वर्ष के व्यक्ति…
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सूरत-नुमा होता तो क्या होता!
ख़ुदा को भूलकर इंसान के दिल का ये आलम है, ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता| चकबस्त बृज नारायण
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क़तरा इन आँखों से जुदा होता!
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी, क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता| चकबस्त बृज नारायण
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कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता!
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर, अगर उनमें से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता| चकबस्त बृज नारायण
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कोसों तलक जंगल हरा होता!
बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता, जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता| चकबस्त बृज नारायण
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ग़म होता न जीने का मज़ा होता!
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता, न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता| चकबस्त बृज नारायण
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शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है!
चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के, शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है| चकबस्त बृज नारायण