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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Jan 2023

    शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई!

    तिरे हाथ से मेरे होंट तक वही इंतिज़ार की प्यास है, मिरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई| बशीर बद्र

  • 20th Jan 2023

    न कभी तुम्हारी झिझक गई!

    भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले, न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई| बशीर बद्र

  • 20th Jan 2023

    तिरी आँख कैसे झपक गई!

    मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की छाँव में, मिरे साथ था तुझे जागना तिरी आँख कैसे झपक गई| बशीर बद्र

  • 20th Jan 2023

    मेरी रात कैसे चमक गई!

    कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई, मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई| बशीर बद्र

  • 20th Jan 2023

    उधार!

    हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी ने तारसप्तक और तीन सप्तकों में प्रतिनिधि कवियों को संकलित करके नई कविता को भी मजबूत आधार प्रदान किया था| लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता…

  • 19th Jan 2023

    उस पर भी निशाना लगता है!

    शाख़ पे बैठी भोली-भाली इक चिड़िया, क्या जाने उस पर भी निशाना लगता है| वसीम बरेलवी

  • 19th Jan 2023

    अकेला है तो सबका लगता है!

    भीड़ में रह कर अपना भी कब रह पाता, चाँद अकेला है तो सबका लगता है| वसीम बरेलवी

  • 19th Jan 2023

    जब सारा ज़माना लगता है!

    प्यार के इस नश्शा को कोई क्या समझे, ठोकर में जब सारा ज़माना लगता है| वसीम बरेलवी

  • 19th Jan 2023

    काग़ज़ पर तस्वीर उतरते ही!

    ज़ेहन से काग़ज़ पर तस्वीर उतरते ही, एक मुसव्विर* कितना अकेला लगता है| *चित्रकार वसीम बरेलवी

  • 19th Jan 2023

    हाथ तुम्हारा लगता है!

    मैं ही न मानूँ मेरे बिखरने में वर्ना, दुनिया भर को हाथ तुम्हारा लगता है| वसीम बरेलवी

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