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निभाते हुए मर जाते हैं!
हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस, जो तअ’ल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
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प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं!
दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं, हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
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युवा जंगल!
आधुनिक हिन्दी कवि और भारत सरकार की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में किसी समय अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –…
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आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा!
ज़ंजीर ओ दीवार ही देखी तुम ने तो ‘मजरूह’ मगर हम, कूचा कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा!
जाओ तुम अपने बाम की ख़ातिर सारी लवें शम्ओं की कतर लो, ज़ख़्म के मेहर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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जान का नुक़साँ तुम से ज़ियादा!
हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुमने भी देखा दूर से लेकिन, ये न समझना हमको हुआ है जान का नुक़साँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा!
अहद-ए-वफ़ा यारों से निभाएँ नाज़-ए-हरीफ़ाँ हँस के उठाएँ, जब हमें अरमाँ तुमसे सिवा था अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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हमको जुनूँ क्या सिखलाते हो!
हमको जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़ियादा, चाक किए हैं हमने अज़ीज़ो चार गरेबाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं!
ऐसे हंस हंस के न देखा करो सबकी जानिब, लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी
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यूँ तो मिला करती हैं सबसे आँखें!
मिलने को यूँ तो मिला करती हैं सबसे आँखें, दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी