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मैं सबके सामने रोने लगा था!
मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया, मैं सबके सामने रोने लगा था| राहत इन्दौरी
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चुराता हूँ अब आँखें आइनों से!
चुराता हूँ अब आँखें आइनों से, ख़ुदा का सामना होने लगा था| राहत इन्दौरी
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अधूरे ही!
आज फिर हिन्दी के विख्यात कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| फिल्मी दुनिया के अपने अनुभव को देखते हुए खुद को ‘गीतफ़रोश’ कहने वाले भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने…
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एक सितारा जल्दी जल्दी डूब गया!
एक सितारा जल्दी जल्दी डूब गया, मैंने जब तारे गिनने की कोशिश की| गुलज़ार
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ख़्वाब ने सारी रात जगाया है!
एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है, मैंने हर करवट सोने की कोशिश की| गुलज़ार