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स्वेटर!
एक बार फिर से मैं आज हिन्दी के एक प्रमुख कवि और साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल के प्रमुख सदस्य रहे स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की…
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मुझे क़र्ज़-दार करती रही!
ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही, कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ| राहत इन्दौरी
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चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की!
है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की, किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ| राहत इन्दौरी
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हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ!
उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है, बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ| राहत इन्दौरी
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ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ!
मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए, तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ| राहत इन्दौरी
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चराग़ों को आफ़्ताब करूँ!
अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ, मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ| राहत इन्दौरी