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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Jan 2023

    तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा!

    तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा, मर रहेंगे अगर अब याद आया| नासिर काज़मी

  • 27th Jan 2023

    वादा-ए-शब याद आया!

    दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से, फिर तिरा वादा-ए-शब याद आया| नासिर काज़मी

  • 27th Jan 2023

    तू मुसीबत में अजब याद आया!

    आज मुश्किल था सँभलना ऐ दोस्त, तू मुसीबत में अजब याद आया| नासिर काज़मी

  • 27th Jan 2023

    दिल धड़कने का सबब याद आया!

    दिल धड़कने का सबब याद आया, वो तिरी याद थी अब याद आया| नासिर काज़मी

  • 27th Jan 2023

    स्वेटर!

    एक बार फिर से मैं आज हिन्दी के एक प्रमुख कवि और साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल के प्रमुख सदस्य रहे स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की…

  • 26th Jan 2023

    मुझे क़र्ज़-दार करती रही!

    ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही, कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ| राहत इन्दौरी

  • 26th Jan 2023

    चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की!

    है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की, किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ| राहत इन्दौरी

  • 26th Jan 2023

    हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ!

    उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है, बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ| राहत इन्दौरी

  • 26th Jan 2023

    ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ!

    मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए, तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ| राहत इन्दौरी

  • 26th Jan 2023

    चराग़ों को आफ़्ताब करूँ!

    अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ, मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ| राहत इन्दौरी

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