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कहानी को नाम क्या दें हम!
ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दें हम,प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
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सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम!
लबों से लब जो मिल गए, लबों से लब जो सिल गए,सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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लिखा था जिस किताब में!
लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है,हुई वही किताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गई!
मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गई,गिलास ग़ुम शराब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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चराग़-ओ-आफ़्ताब ग़ुम!
चराग़-ओ-आफ़्ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी,शबाब की नक़ाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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इंसाफ़ के शाहों की तरह!
जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाये, “फ़ाकिर”,वो भी पेश आये हैं इंसाफ़ के शाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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याद के साये हैं पनाहों की तरह!
हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त,बस तेरी याद के साये हैं पनाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह!
अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते, क्यों कर,दिल ही दुश्मन हैं मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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ऋतुओं की संधि!
आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गीतकार और कुशल मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत, जिसमें ऋतुओं के संधि काल का विशेष वर्णन किया गया…
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ज़माने में यही होता रहा है!
मोहब्बत में ‘फ़िराक़’ इतना न ग़म कर, ज़माने में यही होता रहा है| फ़िराक़ गोरखपुरी