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लेकिन आग बरसती है!
दिल की खेती सूख रही है कैसी ये बरसात हुई, ख़्वाबों के बादल आते हैं लेकिन आग बरसती है| राही मासूम रज़ा
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ये चीज़ तो ख़ैर अब सस्ती है!
दिल जैसा अन-मोल रतन तो जब भी गया बे-राम गया, जान की क़ीमत क्या माँगें ये चीज़ तो ख़ैर अब सस्ती है| राही मासूम रज़ा
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प्यासों की इक बस्ती है!
रंग हवा से छूट रहा है मौसम-ए-कैफ़-ओ-मस्ती है, फिर भी यहाँ से हद्द-ए-नज़र तक प्यासों की इक बस्ती है| राही मासूम रज़ा
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मिलन!
एक बार फिर से मैं आज छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी ने अपनी रचनाओं में पीड़ा की बड़ी प्रभावी अभिव्यक्ति दी है| महादेवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है महादेवी वर्मा जी की…
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हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाब!
उसने बोए दिल-ए-हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाबरेगज़ार उसके लहू से चमन आसा भी था॥ क़तील शिफ़ाई
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आह का अन्दाज़ दुआ-सा भी था!
अपने ज़ख्मो का हमें बक्श रहा था वो सवाबउसकी हर आह का अन्दाज़ दुआ-सा भी था॥ क़तील शिफ़ाई
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सहराओ में घनघोर घटा सा भी था!
गम के सहराओ में घनघोर घटा सा भी था,वो दिलावर जो कई रोज़ का प्यासा भी था॥ क़तील शिफ़ाई
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दिल धड़का हम समझे वो आए है!
रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है,अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है॥ क़तील शिफ़ाई
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दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं!
तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं,एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं॥ क़तील शिफ़ाई