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मंगल-आह्वान
आज ओज और शृंगार दोनों प्रकार की रचनाओं के माध्यम से अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में दिनकर जी ने यह प्रार्थना की है कि उनको ऐसी शक्ति और ऐसा स्वर प्राप्त हो कि वे हर प्रकार के भाव, हर वेदना…
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अमृत पी के अमर हो जाएँगे!
ज़मज़म और गंगा-जल पीकर कौन बचा है मरने से, हम तो आँसू का ये अमृत पी के अमर हो जाएँगे| राही मासूम रज़ा
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तन्हाई से कब लोग रिहाई पाएँगे!
परछाईं के इस जंगल में क्या कोई मौजूद नहीं, इस दश्त-ए-तन्हाई से कब लोग रिहाई पाएँगे| राही मासूम रज़ा
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गीत में ढालेंगे गीतों को गाएँगे!
मौज-ए-हवा की ज़ंजीरें पहनेंगे धूम मचाएँगे, तन्हाई को गीत में ढालेंगे गीतों को गाएँगे| राही मासूम रज़ा
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लेकिन आग बरसती है!
दिल की खेती सूख रही है कैसी ये बरसात हुई, ख़्वाबों के बादल आते हैं लेकिन आग बरसती है| राही मासूम रज़ा
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ये चीज़ तो ख़ैर अब सस्ती है!
दिल जैसा अन-मोल रतन तो जब भी गया बे-राम गया, जान की क़ीमत क्या माँगें ये चीज़ तो ख़ैर अब सस्ती है| राही मासूम रज़ा
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प्यासों की इक बस्ती है!
रंग हवा से छूट रहा है मौसम-ए-कैफ़-ओ-मस्ती है, फिर भी यहाँ से हद्द-ए-नज़र तक प्यासों की इक बस्ती है| राही मासूम रज़ा
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मिलन!
एक बार फिर से मैं आज छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी ने अपनी रचनाओं में पीड़ा की बड़ी प्रभावी अभिव्यक्ति दी है| महादेवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है महादेवी वर्मा जी की…
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हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाब!
उसने बोए दिल-ए-हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाबरेगज़ार उसके लहू से चमन आसा भी था॥ क़तील शिफ़ाई