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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Jun 2026

    तेरी निग़ाहों पे मर मर गए हम!

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में यह गीत- तेरी निग़ाहों पे मर मर गए हम, बांकी अदाओं पे मर मर गए हम!फ़िल्म- शबनमकलाकार- महमूद, एल. विजयलक्ष्मीगीतकार- जावेद अनवरसंगीतकार- उषा खन्नागायक- मुकेशप्रस्तुति- श्रीकृष्ण शर्मा आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******

  • 11th Jun 2026

    उठ जा जल्दी, अब न देर कर!

    प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- उठ जा जल्दी अब न देर कर, बैठे हैं कौवे मुंडेर पर। बदली का मौसम है भाईनहीं दिया सूरज दिखलाई, कहीं छुप गया है उजेर कर। कब तक बाट तकें ये भाईभूख कंठ तक इनके आई, भूखे ही दिन बीत न जाएबारिश अगर झमाझम…

  • 10th Jun 2026

    आसार हुआ करते थे!

    हम को मालूम था आना तो नहीं तुझ को मगर,तेरे आने के तो आसार हुआ करते थे| सलीम कौसर

  • 10th Jun 2026

    एक ये दिन जब लाखों ग़म!

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है जावेद अख़्तर जी का एक और शेर, जिसे जगजीत सिंह जी ने भी गाया था- एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आंसू का! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। ******

  • 10th Jun 2026

    गिरफ़्तार हुआ करते थे!

    इक नज़र रोज़ कहीं जाल बिछाए रखती,और हम रोज़ गिरफ़्तार हुआ करते थे| सलीम कौसर

  • 10th Jun 2026

    और हम भी तिरे!

    तुझ को भी ज़ोम सा रहता था मसीहाई का,और हम भी तिरे बीमार हुआ करते थे| सलीम कौसर

  • 10th Jun 2026

    चल मेरे दिल!

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में यह गीत- चल मेरे दिल, लहरा के चल, मौसम भी है, वादा भी है!फ़िल्म-इशाराकलाकार- जॉय मुखर्जी, वैजयंती मालागीतकार- मजरूह सुल्तानपुरीसंगीतकार- कल्याणजी आनंदजीगायक – मुकेशप्रस्तुति- श्रीकृष्ण शर्मा आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद । *****

  • 10th Jun 2026

    पकी फ़सल के साथ पके दिन!

    आज मैं हिंदी नवगीत के श्रेष्ठतम कवियों में से एक स्वर्गीय रमेश रंजक जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – पकी फ़सल के साथ पके दिनक़लम और दवात के ।धीरे-धीरे छूट…

  • 9th Jun 2026

    हक़दार हुआ करते थे!

    सुनते हैं ऐसा ज़माना भी यहाँ गुज़रा है,हक़ उन्हें मिलता जो हक़दार हुआ करते थे| सलीम कौसर

  • 9th Jun 2026

    कुछ भी था सच के !

    कुछ भी था सच के तरफ़-दार हुआ करते थे,तुम कभी साहब-ए-किरदार हुआ करते थे| सलीम कौसर

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