प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

उठ जा जल्दी अब न देर कर,
बैठे हैं कौवे मुंडेर पर।
बदली का मौसम है भाई
नहीं दिया सूरज दिखलाई,
कहीं छुप गया है उजेर कर।
कब तक बाट तकें ये भाई
भूख कंठ तक इनके आई,
भूखे ही दिन बीत न जाए
बारिश अगर झमाझम आई,
इन्हें न ऋतु सौंदर्य सुहाता
पुण्य करो टुकड़े बिखेर कर।
चाहे इनको पुरखा मानो
या फिर केवल भूखा प्राणी,
जो भी भाव रखो मन में पर
बन जाओ थोड़े तुम दानी
खाकर ये घर की झूठन भी
जाएंगे बस अब न देर कर।
यह कुदरत के हैं बाराती
काग, कबूतर हों या कि चिरैया,
कुछ भोजन पाने की खातिर
है मुंडेर पर ता-ता-थैया
लिए आस आवाज़ लगाते
आओ कुछ दे दो बिखेर कर।
हो आवाज़ भले ही कर्कश
जहां आस यह खुल जाती है
पुण्यकामियों को कौए की
यह ध्वनि भी काफी भाती है,
आ जाते यह दिन निकले ही
आशीषों की धुन बिखेर कर।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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