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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Mar 2023

    ओज़ोन लेयर!

    आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और श्रेष्ठ मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| आज की रचना में उन्होंने आज के जीवन की अनेक प्रकार की विसंगतियों का विवरण दिया है| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…

  • 16th Mar 2023

    पीते रहे हम पिलाते रहे!

    शाइरी ज़हर थी क्या करें ऐ ‘वसीम’, लोग पीते रहे हम पिलाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    हम जाने क्यूँ सर बचाते रहे!

    दूर तक हाथ में कोई पत्थर न था, फिर भी हम जाने क्यूँ सर बचाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    बूढ़े बाबा कहानी सुनाते रहे!

    नन्हे बच्चों ने छू भी लिया चाँद को, बूढ़े बाबा कहानी सुनाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    आँसुओं से इन आँखों में आते रहे!

    शाम आई तो बिछड़े हुए हम-सफ़र, आँसुओं से इन आँखों में आते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    लोग टूटी छतें आज़माते रहे!

    बारिशें आईं और फ़ैसला कर गईं, लोग टूटी छतें आज़माते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    ग़म को जो अपना बताते रहे!

    मेरे ग़म को जो अपना बताते रहे, वक़्त पड़ने पे हाथों से जाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    अगर शाख़ों से धोखा खाते हैं!

    कौन बचाएगा फिर तोड़ने वालों से, फूल अगर शाख़ों से धोखा खाते हैं| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    ख़ुद क़िस्सा हो जाते हैं!

    रोज़ नया इक क़िस्सा कहने वाले लोग, कहते कहते ख़ुद क़िस्सा हो जाते हैं| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    डाली के हो कर रह जाते हैं!

    ख़ुश्बू अपने रस्ते ख़ुद तय करती है, फूल तो डाली के हो कर रह जाते हैं| वसीम बरेलवी

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