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हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या!
कहीं से लौट के हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या, सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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हम!
आज फिर से मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि और प्रसिद्ध उच्च अधिकारी रहे श्री अशोक वाजपेयी जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक जी का किसी समय भारत सरकार की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नीति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा था| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…
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कोई भी फूल मुरझाया न था!
सिर्फ़ ख़ुश्बू की कमी थी ग़ौर के क़ाबिल ‘क़तील’, वर्ना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था| क़तील शिफ़ाई
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वो पहले तो नज़र आया न था!
अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ, अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था| क़तील शिफ़ाई
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किसे दुनिया ने पहनाया न था!
वो पयम्बर हो कि आशिक़ क़त्ल-गाह-ए-शौक़ में, ताज काँटों का किसे दुनिया ने पहनाया न था| क़तील शिफ़ाई
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कोई भी सरमाया न था!
हो गए क़ल्लाश जब से आस की दौलत लुटी, पास अपने और तो कोई भी सरमाया न था| क़तील शिफ़ाई
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कोई हम-साया न था!
ख़ूब रोए छुप के घर की चार-दीवारी में हम, हाल-ए-दिल कहने के क़ाबिल कोई हम-साया न था| क़तील शिफ़ाई
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इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था!
उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिसमें मुख़िल, ज़िंदगी में इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था| क़तील शिफ़ाई
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क्या हमने समझाया न था!
क्या मिला आख़िर तुझे सायों के पीछे भागकर, ऐ दिल-ए-नादाँ तुझे क्या हमने समझाया न था| क़तील शिफ़ाई
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यूँ तो पहले हमको तरसाया न था!
सुर्ख़ आहन पर टपकती बूँद है अब हर ख़ुशी, ज़िंदगी ने यूँ तो पहले हमको तरसाया न था| क़तील शिफ़ाई