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नज़र है आइना-बरदार
छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के, नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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अगर ज़मीर है बेदार!
जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश, अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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एक भी हसीं में नहीं!
बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं, कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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वक़्त का हाकिम!
सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है, पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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हमें गवाह बनाया है!
हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना, ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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इंसानियत की क़द्रों पर
सुकूत* छाया है इंसानियत की क़द्रों** पर, यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें| *Silence **Values क़तील शिफ़ाई
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सूफ़ीनामा!
शायद आज पहली बार मैं स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की कविता शेयर कर रहा हूँ, कैलाश जी दूरदर्शन में उस समय काफी आते थे जब स्वर्गीय कुबेर दत्त जी वहाँ साहित्यिक कार्यक्रम देखते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की यह कविता – घर ,कपड़े, नौकरी,शहर बिना बदले बिना प्रार्थना या उपवास के तुम…
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हथेली पे गाल रक्खा है
भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब, कि जैसे तूने हथेली पे गाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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ख़याल रक्खा है!
हिसाब-ए-लुत्फ़-ए-हरीफ़ाँ किया है जब तो खुला, कि दोस्तों ने ज़ियादा ख़याल रक्खा है| अहमद फ़राज़