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दोपहर का समय था तब – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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वक़्त का मारा लगता है
‘कैफ़’ वो कल का ‘कैफ़’ कहाँ है आज मियाँ, ये तो कोई वक़्त का मारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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फूल कँवारा लगता है!
तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है, फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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इतना बेचारा लगता है!
किसको ख़बर ये कितनी क़यामत ढाता है, ये लड़का जो इतना बेचारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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सुब्ह का तारा लगता है!
तेरा चेहरा सुब्ह का तारा लगता है, सुब्ह का तारा कितना प्यारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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जिस ओर करो संकेत!
लंबे समय के बाद आज फिर से मैं फिल्मों में अपने प्रिय गीतकार, जनकवि स्वर्गीय शैलेंद्र जी का साहित्यिक गीत शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेंद्र जी का यह गीत – जिस ओर करो संकेत मात्र, उड़ चले विहग मेरे मन का,जिस ओर बहाओ तुम स्वामी, बह चले श्रोत इस जीवन…