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हमने ख़ताएँ भेजी हैं!
तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं, सज़ाएँ भेज दो हमने ख़ताएँ भेजी हैं| गुलज़ार
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तुमको रुलाएँ भेजी हैं
तुम्हारी ख़ुश्क सी आँखें भली नहीं लगतीं, वो सारी चीज़ें जो तुमको रुलाएँ, भेजी हैं| गुलज़ार
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बहुत सी दुआएँ भेजी हैं
गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं, गुलों के हाथ बहुत सी दुआएँ भेजी हैं| गुलज़ार
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नवनिर्माण का संकल्प!
आज एक फिर से मैं श्रेष्ठ गीतकार और देश में नवगीत आंदोलन के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह गीत – विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर! यहाँ राह अपनी बनाने चले हम,यहाँ प्यास अपनी बुझाने चले हम,जहाँ…
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बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ!
क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात, करवटें, बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ| कैफ़ भोपाली