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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Apr 2023

    ये ज़ेवर हैं पीतल!

    ये गुल काग़ज़ हैं ये ज़ेवर हैं पीतल, समझ में जब ये आ जाए तो कहना| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    रास आए तो कहना!

    ये दुनिया तुमको रास आए तो कहना. न सर पत्थर से टकराए तो कहना| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    जाग उट्ठी ज़िंदगानी!

    अँधेरे ढल गए रौशन हुए मंज़र ज़मीं जागी फ़लक जागा, तो जैसे जाग उट्ठी ज़िंदगानी, मगर कुछ याद-ए-माज़ी ओढ़ के सोए हुए लोगों को लगता है जगाने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    नए रस्ते बनाने में!

    पुरानी मंज़िलों का शौक़ तो किसको है बाक़ी, अब नई हैं मंज़िलें हैं सबके दिल में जिनके अरमाँ, बना लेना नई मंज़िल न था मुश्किल मगर ऐ दिल, नए रस्ते बनाने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    नए अरमाँ सजाने में!

    कोई टूटे हुए शीशे लिए अफ़्सुर्दा-ओ-मग़्मूम, कब तक यूँ गुज़ारे बे-तलब बे-आरज़ू दिन, तो इन ख़्वाबों की किर्चें हम ने पलकों से झटक दीं पर, नए अरमाँ सजाने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    अभी कुछ दिन लगेंगे!

    कभी हमको यक़ीं था ज़ो’म था दुनिया हमारी जो मुख़ालिफ़ है तो हो जाए, मगर तुम मेहरबाँ हो, हमें ये बात वैसे याद तो अब क्या है लेकिन, हाँ इसे यकसर भुलाने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    अभी कुछ दिन लगेंगे!

    ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर, नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे, बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक, पर उनको मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर

  • 23rd Apr 2023

    प्यार तुम्हें दे सकता हूँ!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि, जो राजनेता भी हैं, सांसद रहे हैं और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य भी रहे हैं, ऐसे श्री उदयप्रताप सिंह  जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|  श्री उदयप्रताप सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…

  • 22nd Apr 2023

    फ़ासला लगे है मुझे!

    अब एक आध क़दम का हिसाब क्या रखिए, अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर

  • 22nd Apr 2023

    ख़ौफ़ सा लगे है मुझे!

    न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है, कभी कभी तो बड़ा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर

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