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मेरा तेरा ख़ून बहा है!
जब भी कोई तख़्त सजा है मेरा तेरा ख़ून बहा है, दरबारों की शान-ओ-शौकत मैदानों की शमशीरें हैं| निदा फ़ाज़ली
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चंद घरों में ताबीरें हैं!
आज और कल की बात नहीं है सदियों की तारीख़ यही है, हर आँगन में ख़्वाब हैं लेकिन चंद घरों में ताबीरें हैं| निदा फ़ाज़ली
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एकसी लेकिन ज़ंजीरें हैं
मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं, जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं| निदा फ़ाज़ली
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इन दिनों!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में जिस समस्या का उल्लेख किया है, उसका सामना वरिष्ठ साहित्यकारों को खूब करना पड़ता है| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री…
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मोहलत कभी कभी!
फिर खो न जाएँ हम कहीं दुनिया की भीड़ में, मिलती है पास आने की मोहलत कभी कभी| साहिर लुधियानवी
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तन्हा न कट सकेंगे!
तन्हा न कट सकेंगे जवानी के रास्ते, पेश आएगी किसी की ज़रूरत कभी कभी| साहिर लुधियानवी
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ये क़यामत कभी कभी
खुलते नहीं हैं रोज़ दरीचे बहार के, आती है जान-ए-मन ये क़यामत कभी कभी| साहिर लुधियानवी
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इनायत कभी कभी!
मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी, होती है दिलबरों की इनायत कभी कभी| साहिर लुधियानवी
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निबाह रहा हो रक़ीब से
इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ, जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से| साहिर लुधियानवी