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हल्दीघाटी / प्रथम सर्ग
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य में ओज के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय श्याम नारायण पाण्डेय जी के प्रसिद्ध काव्य ‘हल्दीघाटी’ का प्रथम सर्ग शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्याम नारायण पाण्डेय जी की यह कविता – वण्डोली है यही¸ यहीं परहै…
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ख़्वाहिश चुनी हुई!
इन बद-नसीब आँखों ने देखी है बार बार, दीवार में ग़रीब की ख़्वाहिश चुनी हुई| मुनव्वर राना
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बात पुरानी कही हुई!
दोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुई, तस्वीर तेरे घर में थी मेरी लगी हुई| मुनव्वर राना
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कि तेरी याद भी अब!
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया मोहब्बत ने, कि तेरी याद भी अब कोशिशों से आती है| मुनव्वर राना
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अँधेरे हसीन लगते हैं!
इसीलिए तो अँधेरे हसीन लगते हैं, कि रात मिल के तिरे गेसुओं से आती है| मुनव्वर राना
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आँसुओं से आती है!
हमारी आँखों को मैला तो कर दिया है मगर, मोहब्बतों में चमक आँसुओं से आती है| मुनव्वर राना
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मुश्किलों से आती है!
हमीं अकेले नहीं जागते हैं रातों में, उसे भी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है| मुनव्वर राना
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ख़बर तुम्हारी भी!
तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती है, ख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है| मुनव्वर राना
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दिल्ली जाने का समय!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – बचपन की मुस्कुराहटों पररखे जा रहे हैं पत्थरगिरवी रखे जा रहे…
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दुनिया नई पैदा करें!
इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक, आइए मिल-जुल के इक दुनिया नई पैदा करें| नज़ीर बनारसी