आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता –

बचपन की मुस्कुराहटों पर
रखे जा रहे हैं पत्थर
गिरवी रखे जा रहे हैं जवानी के सपने
बुढ़ापे की उम्मीदों को धोखा दिया जा रहा है
दिन-रात।
तकनीकी नाकेबंदी की जकड़ में है गंगा
यमुना के गले में उग रही है कंकड़ों की फ़सल
समुद्र को अलविदा कहने पर
मज़बूर की जा रही है नर्मदा।
गोमुख का भूगोल टेढ़ा हो रहा है
टेढ़ा हो रहा है हरि की पैड़ी का भूगोल
हरिद्वार का भूगोल टेढ़ा हो रहा है।
मेरठ जाने का समय है यह
समय है कानपुर, प्रयाग, पटना और कलकत्ता जाने का।
दिल्ली जाने का समय है यह
सरस्वती-पथ का सरण करने वाली है गंगा।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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