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कर्णधार तू बना तो!
आज एक बार फिर से मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख नाम रहे स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – कर्णधार तू…
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तो धज्जियाँ उड़ जाएँ!
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर, जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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पगड़ियाँ उड़ जाएँ!
हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से, सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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आसमाँ उड़ जाएँ!
रहे ख़याल कि मज्ज़ूब*-ए-इश्क़ हैं हम लोग, अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ| *डूबा हुआ राहत इंदौरी
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किताब साँसों की!
बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की, ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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हड्डियाँ उड़ जाएँ!
ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है, बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी