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तेरी रहगुज़र भी नहीं!
न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ, इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इक नज़र भी नहीं!
बरस रही है हरीम-ए-हवस में दौलत-ए-हुस्न, गदा-ए-इश्क़ के कासे में इक नज़र भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इस क़दर भी नहीं!
वफ़ा-ए-वादा नहीं वादा-ए-दिगर भी नहीं, वो मुझसे रूठे तो थे लेकिन इस क़दर भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हम-कलाम कब से है!
कहाँ गए शब-ए-फ़ुर्क़त के जागने वाले, सितारा-ए-सहरी हम-कलाम कब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तेरे रंग-ए-लब से है
अगर शरर है तो भड़के जो फूल है तो खिले, तरह तरह की तलब तेरे रंग-ए-लब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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गिला है जो भी किसी से
किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म, गिला है जो भी किसी से तिरे सबब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तिरा इंतिज़ार जब से है!
तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है, न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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स्मृतिकण!
आज मैं शायद पहली बार स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भगवतीचरण वर्मा जी अपने उपन्यासों के कारण अधिक प्रसिद्ध हुए थे, लेकिन वे अच्छे कवि भी थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की यह कविता – क्या जाग रही होगी तुम भी?निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये! अपना…
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हम आबाद करते हैं!
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त