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धूप ढल तो सकती है!
कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के, मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मचल तो सकती है!
बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी, फ़सुर्दगी में तबीअ‘त मचल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उछल तो सकती है
पलट पड़े न कहीं उस निगाह का जादू, कि डूब कर ये छुरी कुछ उछल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रौशनी मुझ मिल जाए!
अजब नहीं कि वही रौशनी मुझ मिल जाए, मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा| राहत इंदौरी
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किसी चराग़ की मानिंद
उजाले बाँटने वालों पे क्या गुज़रती है, किसी चराग़ की मानिंद जल के देखूँगा| राहत इंदौरी
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लहजा बदल के देखूँगा
वो मेरे हुक्म को फ़रियाद जान लेता है, अगर ये सच है तो लहजा बदल के देखूँगा| राहत इंदौरी
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पथरा गईं आँखें!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – उत्खनन में जब मिले अवशेषवर्जना-दंशित समर्पण केदेखकर पथरा गईं आँखें । कमल-दल…
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पहले ही ढल के देखूँगा
मज़ाक़ अच्छा रहेगा ये चाँद-तारों से, मैं आज शाम से पहले ही ढल के देखूँगा| राहत इंदौरी
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आगे निकल के देखूँगा!
सवाल ये है कि रफ़्तार किसकी कितनी है, मैं आफ़्ताब से आगे निकल के देखूँगा| राहत इंदौरी