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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Nov 2023

    धूप ढल तो सकती है!

    कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के, मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    मचल तो सकती है!

    बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी, फ़सुर्दगी में तबीअ‘त मचल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    उछल तो सकती है

    पलट पड़े न कहीं उस निगाह का जादू, कि डूब कर ये छुरी कुछ उछल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    चुप सी लग गई वर्ना!

    तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना, कहानियों से शब-ए-ग़म बहल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Nov 2023

    रौशनी मुझ मिल जाए!

    अजब नहीं कि वही रौशनी मुझ मिल जाए, मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा|     राहत इंदौरी

  • 6th Nov 2023

    किसी चराग़ की मानिंद

    उजाले बाँटने वालों पे क्या गुज़रती है, किसी चराग़ की मानिंद जल के देखूँगा| राहत इंदौरी

  • 6th Nov 2023

    लहजा बदल के देखूँगा

    वो मेरे हुक्म को फ़रियाद जान लेता है, अगर ये सच है तो लहजा बदल के देखूँगा| राहत इंदौरी

  • 6th Nov 2023

    पथरा गईं आँखें!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – उत्खनन में जब मिले अवशेषवर्जना-दंशित समर्पण केदेखकर पथरा गईं आँखें । कमल-दल…

  • 5th Nov 2023

    पहले ही ढल के देखूँगा

    मज़ाक़ अच्छा रहेगा ये चाँद-तारों से, मैं आज शाम से पहले ही ढल के देखूँगा| राहत इंदौरी

  • 5th Nov 2023

    आगे निकल के देखूँगा!

    सवाल ये है कि रफ़्तार किसकी कितनी है, मैं आफ़्ताब से आगे निकल के देखूँगा| राहत इंदौरी

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