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गीतों से पहले!
आज मैं हिन्दी के एक विख्यात नवगीतकार श्री रवींद्र भ्रमर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भ्रमर जी की अधिक रचनाएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रवींद्र भ्रमर जी का यह गीत – पँछी में गाने का गुन हैदो तिनके चुनकरवह तृप्त जहाँ होता हैगीतों की…
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काग़ज़ बिखर रहे हैं!
किस तरह जम्अ‘ कीजिए अब अपने आपको, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के| आदिल मंसूरी
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चमकते सराब के!
बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें, दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब* के| *रेगिस्तान में जल का आभास (मृग जल) आदिल मंसूरी
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जाले थे ख़्वाब के!
सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा, जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के| आदिल मंसूरी