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उसी ख़ाना-ख़राब के!
वो जो तुम्हारे हाथ से आकर निकल गया, हम भी क़तील* हैं उसी ख़ाना-ख़राब के| *Victim of Love, Killed by आदिल मंसूरी
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आशिक़ थे शहर में जो!
आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के, हैं उनके दिल में वसवसे अब एहतिसाब* के| *नशाबंदी आदिल मंसूरी
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एक अंतर्कथा, भाग-1
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात प्रगतिशील कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक लंबी कविता का प्रारंभिक भाग शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता – अग्नि के काष्ठखोजती माँ,बीनती नित्य…
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शाख़ फल तो सकती है
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार, यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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पिघल तो सकती है!
सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के, कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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कि गिरते गिरते भी!
तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और, कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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गल तो सकती है!
ग़म-ए-ज़माना-ओ-सोज़-ए-निहाँ की आँच तो दे, अगर न टूटे ये ज़ंजीर गल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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अज़ल से सोई है!
अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद, अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बात बिरानी हो जाती है!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – मेरे मन की साध आंख में झांक आंक लोकह देने पर बात…