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बीच भँवर में मारोगे!
किसको पार उतारा तुम ने किसको पार उतारोगे, मल्लाहो तुम परदेसी को बीच भँवर में मारोगे| इब्न-ए-इंशा
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कारोबार-ए-वफ़ा!
चलाए जाओ ‘क़तील’ अपना कारोबार-ए-वफ़ा, जो इसमें जान भी जाए तो कुछ ख़सारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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झूमर तुम्हारे माथे का!
बना सकूँ जिसे झूमर तुम्हारे माथे का, फ़लक पे आज भी ऐसा कोई सितारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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आश्ना हमारा नहीं!
हर एक रब्त तिरे वास्ते से था वर्ना, भरे जहाँ में कोई आश्ना हमारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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सफ़ीना पहुँचा है!
मिरा तो सिर्फ़ भँवर तक सफ़ीना पहुँचा है, तुझे तो डूबने वालों ने भी पुकारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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दामन कभी पसारा नहीं
ये इल्तिफ़ात* की भीक अपने पास रहने दे, तिरे फ़क़ीर ने दामन कभी पसारा नहीं| *Kindness क़तील शिफ़ाई
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क्या घटा के सिवा!
तुम्हारे ज़िक्र से याद आए क्या घटा के सिवा, हमारे पास कोई और इस्तिआरा* नहीं| *Example क़तील शिफ़ाई
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कौन भुलाता है!
ख़ुशी से कौन भुलाता है अपने प्यारों को, क़ुसूर इसमें ज़माने का है तुम्हारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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काली सलाखों में बंद!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत – रात, में घूमता रहा काली सलाखों में बंदकोई…