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आँखों में समा न सके!
तू ऐ दोस्त कहाँ ले आया चेहरा ये ख़ुर्शीद-मिसाल, सीने में आबाद करेंगे आँखों में तो समा न सके| इब्न-ए-इंशा
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हाथ हमीं फैला न सके!
सबको दिल के दाग़ दिखाए एक तुझी को दिखा न सके, तेरा दामन दूर नहीं था हाथ हमीं फैला न सके| इब्न-ए-इंशा
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क्या नक़्श उभारोगे!
उनका हमसे प्यार का रिश्ता ऐ दिल छोड़ो भूल चुको, वक़्त ने सब कुछ मेट दिया है अब क्या नक़्श उभारोगे| इब्न-ए-इंशा
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कल तुम इन्हें पुकारोगे!
अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअ‘ल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें, कल तुम इनको याद करोगे कल तुम इन्हें पुकारोगे| इब्न-ए-इंशा
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खेलोगे तो हारोगे!
आज तो हम को पागल कह लो पत्थर फेंको तंज़ करो, इश्क़ की बाज़ी खेल नहीं है खेलोगे तो हारोगे| इब्न-ए-इंशा
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जी से हमें बिसारोगे!
मुँह देखे की मीठी बातें सुनते इतनी उम्र हुई, आँख से ओझल होते होते जी से हमें बिसारोगे| इब्न-ए-इंशा
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बीच भँवर में मारोगे!
किसको पार उतारा तुम ने किसको पार उतारोगे, मल्लाहो तुम परदेसी को बीच भँवर में मारोगे| इब्न-ए-इंशा
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कारोबार-ए-वफ़ा!
चलाए जाओ ‘क़तील’ अपना कारोबार-ए-वफ़ा, जो इसमें जान भी जाए तो कुछ ख़सारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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झूमर तुम्हारे माथे का!
बना सकूँ जिसे झूमर तुम्हारे माथे का, फ़लक पे आज भी ऐसा कोई सितारा नहीं| क़तील शिफ़ाई