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जिगर जला भी गया!
हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया, ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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मेरे तिरे दरमियाँ तो है!
मुझ से बहुत क़रीब है तू फिर भी ऐ ‘मुनीर’, पर्दा सा कोई मेरे तिरे दरमियाँ तो है| मुनीर नियाज़ी
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शायद वो मिल ही जाए!
आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए, वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है| मुनीर नियाज़ी
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मगर पासबाँ तो है!
इक चील एक मुम्टी पे बैठी है धूप में, गलियाँ उजड़ गई हैं मगर पासबाँ तो है| मुनीर नियाज़ी
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कहीं गुल्सिताँ तो है!
यूँ तो है रंग ज़र्द मगर होंट लाल हैं, सहरा की वुसअ’तों में कहीं गुल्सिताँ तो है| मुनीर नियाज़ी
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कोई दास्ताँ तो है!
देती नहीं अमाँ जो ज़मीं आसमाँ तो है, कहने को अपने दिल से कोई दास्ताँ तो है| मुनीर नियाज़ी
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बनेंगी साँपिन!
आज एक बार फिर से मैं मेरे लिए गुरुतुल्य रहे हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – बंद हैं मुट्ठी मेंचंद सुर्ख-पंक्तियाँमुट्ठी…
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बूँदें दो बरसा न सके!
मन पापी की उजड़ी खेती सूखी की सूखी ही रही, उमडे बादल गरजे बादल बूँदें दो बरसा न सके| इब्न-ए-इंशा
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दिल को समझा न सके
ना तुझसे कुछ हमको निस्बत ना तुझको कुछ हम से काम, हमको ये मालूम था लेकिन दिल को ये समझा न सके| इब्न-ए-इंशा